Tuesday, April 6, 2010

मन के खेल

सामने शून्य जगत में जो परिवर्तन हो रहे हैं
वे अज्ञान के कारण ही यथार्थ दीख पड़ते हैं ;
सत्य के पीछे दौड़ने की कोशिश मत करो,
केवल मन की सारी आस्थाओं और विचारों को छोड़ दो ।
- ओशो 

ज्योंही सत-असत का द्वैत खड़ा होता है, 
भ्रांति पैदा होती है, मन खो जाता है । 

हम अपने मन को पहचाने, देखें । 
इसकी गति-विधि का निरीक्षण करें ;
जिसे तुम चाहते हो, उसे  उसके विरुद्ध खड़ा कर देना । 
जिसे तुम नहीं चाहते - मन का सबसे बड़ा रोग है । 
जब पथ के गूढ़ अर्थ का पता नहीं होता, 
तब मन की शांति भंग होती है, जीवन व्यर्थ होता है । 
निरीक्षक, पक्ष ग्रहण न करे, बल्कि अपनी वासनाओं, विचारों को ऐसे ही देखे जैसे कोई सागर पर खड़ा हो, सागर की लहरों को देखता हो । कृष्णमूर्ति ने इसे निर्विकल्प सजगता कहा है । यह बिल्कुल तटस्थ निरीक्षण है ।

1 comment:

  1. हम अपने मन को पहचाने, देखें ।
    इसकी गति-विधि का निरीक्षण करें ;
    जिसे तुम चाहते हो, उसे उसके विरुद्ध खड़ा कर देना ।
    जिसे तुम नहीं चाहते - मन का सबसे बड़ा रोग है ।
    सत्य वचन है! बहुत बढ़िया लगा! इस बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई!

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